नेपाल : स्वतंत्र राष्ट्र, किंतु भारतवर्षीय सभ्यता का अभिन्न सांस्कृतिक अंग
क्या नेपाल कभी भारत का हिस्सा था?

नेपाल और भारत के संबंध दक्षिण एशिया के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय हैं । आधुनिक काल में इन संबंधों पर चर्चा होते ही प्रायः दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण सामने आते हैं । एक दृष्टिकोण नेपाल को प्राचीन काल से पूर्णतः स्वतंत्र और भारत से पृथक सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि दूसरा दृष्टिकोण उसे भारत का ऐतिहासिक अंग सिद्ध करने का प्रयास करता है । दोनों ही दृष्टिकोण इतिहास की जटिलताओं को अत्यधिक सरल बना देते हैं और आंशिक सत्य का ही प्रतिनिधित्व करते हैं ।
वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक और सूक्ष्म है । नेपाल न तो आधुनिक भारत गणराज्य का कोई ऐतिहासिक प्रांत था और न ही वह भारतवर्षीय सभ्यता से पृथक कोई स्वतंत्र सांस्कृतिक द्वीप रहा है । इतिहास, पुराण, अभिलेख, तीर्थ-परंपरा, भाषा, दर्शन और धार्मिक स्रोतों का निष्पक्ष अध्ययन बताता है कि नेपाल का राजनीतिक अस्तित्व प्राचीन है, किन्तु उसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और दार्शनिक जड़ें उसी व्यापक भारतवर्षीय सभ्यता में गहराई से जुड़ी रही हैं, जिसने सहस्राब्दियों तक हिमालय से समुद्र तक फैले विशाल भूभाग को एक साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में बाँधे रखा।
भारतवर्ष और आधुनिक भारत : दोनों एक नहीं हैं
नेपाल और भारत के ऐतिहासिक संबंधों को समझने के लिए सर्वप्रथम “भारतवर्ष” और “आधुनिक भारत” के बीच के अंतर को समझना आवश्यक है। वर्तमान भारत एक आधुनिक संप्रभु राष्ट्र-राज्य (Nation-State) है, जिसकी राजनीतिक सीमाएँ संविधान, प्रशासनिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून द्वारा निर्धारित हैं। इसके विपरीत प्राचीन ग्रंथों में वर्णित “भारतवर्ष” मुख्यतः एक सांस्कृतिक, धार्मिक और सभ्यतागत अवधारणा थी, न कि आधुनिक अर्थों में कोई केंद्रीकृत राजनीतिक राज्य । विष्णु पुराण में भारतवर्ष का वर्णन इस प्रकार किया गया है—
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
अर्थात् समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण स्थित भूभाग भारतवर्ष कहलाता है, जहाँ भारती संतति निवास करती है । प्राचीन भारतवर्ष की यह अवधारणा आधुनिक भारत गणराज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं थी । यह एक विशाल सभ्यतागत क्षेत्र था, जिसका सांस्कृतिक प्रभाव वर्तमान भारत के अतिरिक्त नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के कुछ भागों तक दिखाई देता है । दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक क्षेत्रों—जैसे इंडोनेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड और बाली—पर भी भारतीय संस्कृति, रामायण, महाभारत, संस्कृत भाषा, बौद्ध और हिन्दू परंपराओं की गहरी छाप देखने को मिलती है ।
वास्तव में भारतवर्ष की अवधारणा मुख्यतः सांस्कृतिक और सभ्यतागत एकता पर आधारित थी, यद्यपि विभिन्न कालों में अनेक शक्तिशाली राजसत्ताओं ने इसके बड़े भूभाग को राजनीतिक रूप से भी एकीकृत किया । विभिन्न राज्यों, गणराज्यों और राजवंशों की अपनी-अपनी राजनीतिक पहचान थी, किन्तु धर्म, दर्शन, तीर्थ-परंपरा, संस्कृत भाषा, पौराणिक स्मृतियों और आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि ने उन्हें एक व्यापक सभ्यतागत सूत्र में बाँध रखा था ।
नेपाल इसी व्यापक भारतवर्षीय सांस्कृतिक संसार का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है । जब नेपाल को भारतवर्षीय सभ्यता से संबद्ध कहा जाता है, तो उसका अर्थ किसी राजनीतिक अधीनता या आधुनिक राष्ट्रीय पहचान के निषेध से नहीं है, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक विरासत से है जिसने सहस्राब्दियों तक हिमालय से समुद्र तक और हिमालय के पार के अनेक क्षेत्रों तक विस्तृत सभ्यतागत संसार को एक सूत्र में बाँधे रखा । यद्यपि भारतवर्ष की अवधारणा मुख्यतः सभ्यतागत और सांस्कृतिक थी, तथापि विभिन्न कालों में अनेक शक्तिशाली राजसत्ताओं ने इसके बड़े भूभाग को राजनीतिक रूप से भी एकीकृत किया ।
नेपाल : वैदिक और पौराणिक परंपरा में
यद्यपि वैदिक साहित्य में “नेपाल” नाम का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, तथापि हिमालय और उत्तर के पर्वतीय क्षेत्रों का उल्लेख बार-बार मिलता है । स्कन्दपुराण के नेपालमहात्म्य में नेपाल को देवभूमि और तीर्थभूमि के रूप में वर्णित किया गया है । काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर केवल नेपाल का राष्ट्रीय तीर्थ नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्षीय शैव परंपरा का एक प्रमुख केंद्र है । सदियों से भारत और नेपाल के साधु-संत, विद्वान और तीर्थयात्री यहाँ आते रहे हैं ।
जनकपुर : जहाँ से रामायण का एक महत्वपूर्ण अध्याय प्रारम्भ होता है
वर्तमान नेपाल में स्थित जनकपुर माता सीता की जन्मभूमि माना जाता है । राजा जनक केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि भारतीय दर्शन में आदर्श राजर्षि के रूप में प्रतिष्ठित हैं । बृहदारण्यक उपनिषद में जनक और याज्ञवल्क्य के संवाद भारतीय दर्शन की अमूल्य धरोहर हैं । सीता की कथा केवल नेपाल की नहीं, सम्पूर्ण भारतवर्ष की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। इसी कारण जनकपुर नेपाल का ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय सांस्कृतिक संसार का साझा तीर्थ है । वाल्मीकि रामायण में ‘नेपाल’ नाम का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता । तथापि रामायण में वर्णित मिथिला, जनक और सीता की परंपरा वर्तमान नेपाल के जनकपुर क्षेत्र से जुड़ी हुई मानी जाती है । इससे स्पष्ट होता है कि यद्यपि ‘नेपाल’ नाम बाद के साहित्य में प्रमुखता से प्रकट होता है, तथापि वर्तमान नेपाल का भूभाग प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से घनिष्ठ रूप से संबद्ध था ।
लुम्बिनी : जहाँ बुद्ध का जन्म हुआ
लुम्बिनी विश्व इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है। यहीं सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ, जो आगे चलकर बुद्ध कहलाए। वर्तमान समय में लुम्बिनी नेपाल में स्थित है, जबकि बुद्ध को ज्ञान बोधगया में प्राप्त हुआ, उन्होंने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया और महापरिनिर्वाण कुशीनगर में प्राप्त किया। इस प्रकार बुद्ध का जीवन आधुनिक भारत और नेपाल दोनों की साझा सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है ।
बौद्ध साहित्य में लुम्बिनी, कपिलवस्तु, शाक्य गणराज्य, कोशल और मगध का उल्लेख मिलता है, किंतु ‘नेपाल’ नाम का उल्लेख नहीं मिलता । इससे स्पष्ट होता है कि ‘नेपाल’ नाम उत्तरकालीन साहित्य और अभिलेखों में अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होता है । वर्तमान नेपाल का भूभाग प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक, धार्मिक और बौद्ध परंपराओं से घनिष्ठ रूप से संबद्ध था । बुद्ध का जीवन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक राजनीतिक सीमाओं से बहुत पहले यह सम्पूर्ण क्षेत्र एक साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संसार का अंग था ।
लिच्छवि अभिलेख और संस्कृत परंपरा
नेपाल के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख लिच्छवि काल से प्राप्त होते हैं । चांगुनारायण मंदिर का अभिलेख संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है और उसकी शैली तत्कालीन भारतीय अभिलेखीय परंपरा से पूर्ण साम्य रखती है । इन अभिलेखों में विष्णु, शिव, देवी, यज्ञ, दान और मंदिर-निर्माण का उल्लेख मिलता है, जो यह स्पष्ट करता है कि नेपाल की धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना व्यापक भारतवर्षीय परंपरा से गहराई से जुड़ी हुई थी । विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि नेपाल के प्रारम्भिक राजकीय अभिलेख संस्कृत भाषा में उपलब्ध हैं, जो उस समय की व्यापक भारतवर्षीय सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपरा से उसके गहरे संबंधों को रेखांकित करते हैं ।
समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति क्या बताती है?
समुद्रगुप्त की प्रसिद्ध प्रयाग-प्रशस्ति में नेपाल का उल्लेख सीमांत राज्यों में किया गया है । इससे यह स्पष्ट होता है कि नेपाल का राजनीतिक अस्तित्व प्राचीन था । साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि नेपाल भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से पूर्णतः पृथक नहीं था । विशेष उल्लेखनीय है कि प्रयाग प्रशस्ति में नेपाल का पृथक राजनीतिक इकाई के रूप में उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि सांस्कृतिक निकटता और राजनीतिक स्वतंत्रता दोनों साथ-साथ अस्तित्व में रह सकती थीं ।
क्या प्राचीन नेपाल एकीकृत राष्ट्र था ?
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है । आज का नेपाल जिस रूप में दिखाई देता है, वह प्राचीन काल से वैसा नहीं था । काठमांडू, पाटन, भक्तपुर, गोरखा, मकवानपुर, बाइसी और चौबिसी राज्यों सहित अनेक स्वतंत्र राजनीतिक इकाइयाँ विभिन्न कालों में अस्तित्व में थीं । इनके बीच संघर्ष, संधियाँ और सत्ता परिवर्तन होते रहे । अर्थात नेपाल की सांस्कृतिक एकता प्राचीन है, लेकिन उसका आधुनिक राजनीतिक स्वरूप अपेक्षाकृत नवीन है ।
पृथ्वीनारायण शाह और आधुनिक नेपाल का निर्माण
अठारहवीं शताब्दी में गोरखा नरेश पृथ्वीनारायण शाह ने विभिन्न राज्यों को एकीकृत कर आधुनिक नेपाल की नींव रखी । 1768–69 के बाद नेपाल एक संगठित राजनीतिक इकाई के रूप में उभरता है । इसी कारण पृथ्वीनारायण शाह को आधुनिक नेपाल का निर्माता माना जाता है ।
गोरखा विस्तार और गढ़वाल
नेपाल के राजनीतिक एकीकरण के बाद गोरखा शक्ति ने पश्चिम की ओर विस्तार किया । कुमाऊँ, गढ़वाल और हिमालय के अनेक क्षेत्रों पर कुछ समय के लिए गोरखा शासन स्थापित हुआ । नेपाल के इतिहास में इसे राज्य-निर्माण की प्रक्रिया का भाग माना जाता है, किंतु गढ़वाल और कुमाऊँ की लोकस्मृति में यह काल सामान्यतः कष्ट, कराधान, बेगार और संघर्ष के समय के रूप में स्मरण किया जाता है । गढ़वाली लोकगीतों और लोककथाओं में “गोरख्याणी” काल आज भी पीड़ा, प्रतिरोध और संघर्ष के प्रतीक के रूप में जीवित है । इतिहासकार हरिकृष्ण रतूड़ी और बद्रीदत्त पांडे जैसे विद्वानों ने भी इस काल की सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों का उल्लेख किया है । इतिहास का संतुलित अध्ययन हमें यह सिखाता है कि किसी भी साम्राज्य का मूल्यांकन केवल विजेताओं की दृष्टि से नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की स्मृतियों और अनुभवों के आधार पर भी किया जाना चाहिए ।
सुगौली संधि और आधुनिक सीमा
नेपाल और आधुनिक भारत की राजनीतिक सीमाओं के इतिहास में 1816 ईस्वी की सुगौली संधि का विशेष महत्व है। एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814–1816) के उपरांत ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के मध्य संपन्न इस संधि ने दोनों पक्षों की सीमाओं को औपचारिक रूप से निर्धारित किया । इसी संधि के परिणामस्वरूप नेपाल ने कुमाऊँ, गढ़वाल, सिक्किम के कुछ भाग तथा तराई क्षेत्र के अनेक भूभागों पर अपना अधिकार त्याग दिया ।
आधुनिक भारत और नेपाल की सीमा-व्यवस्था का मूल आधार यही संधि मानी जाती है । वर्तमान समय में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे क्षेत्रों को लेकर जो सीमा-विवाद समय-समय पर सामने आते हैं, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी काफी हद तक इसी संधि तथा उसकी विभिन्न व्याख्याओं से जुड़ी हुई है ।
किन्तु यह समझना आवश्यक है कि ऐसे विवाद राजनीतिक भूगोल, संधियों और अंतरराष्ट्रीय कानून के विषय हैं । इन्हें सांस्कृतिक, धार्मिक अथवा सभ्यतागत संबंधों के साथ मिश्रित नहीं किया जाना चाहिए । इतिहास यह दर्शाता है कि राजनीतिक सीमाएँ समय के साथ बदलती रही हैं, जबकि सांस्कृतिक संबंध अक्सर उनसे कहीं अधिक स्थायी सिद्ध होते हैं ।
अतः सुगौली संधि आधुनिक नेपाल और भारत की राजनीतिक सीमाओं को समझने का महत्वपूर्ण आधार अवश्य है, किंतु नेपाल और भारत के प्राचीन सांस्कृतिक, धार्मिक और सभ्यतागत संबंधों का मूल्यांकन केवल इसके आधार पर नहीं किया जा सकता । वे संबंध इस संधि से कहीं अधिक प्राचीन और व्यापक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में विकसित हुए थे ।
पशुपतिनाथ : सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रमाण
नेपाल और भारत की साझा सभ्यतागत विरासत का सबसे प्रभावशाली उदाहरण पशुपतिनाथ मंदिर है । इस मंदिर की एक अनूठी परंपरा यह है कि इसके मुख्य पुजारी परंपरागत रूप से दक्षिण भारत के वैदिक ब्राह्मणों में से नियुक्त किए जाते हैं । यह व्यवस्था सदियों से चली आ रही है । हिमालय से लेकर दक्षिण भारत तक फैली यह आध्यात्मिक परंपरा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सांस्कृतिक संबंध राजनीतिक सीमाओं से कहीं अधिक स्थायी होते हैं ।
क्या ऐतिहासिक दावे आधुनिक सीमाओं को बदल सकते हैं?
समय-समय पर नेपाल के कुछ राजनीतिक समूहों और नेताओं द्वारा कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा के अतिरिक्त अल्मोड़ा, टनकपुर अथवा अन्य क्षेत्रों पर भी ऐतिहासिक दावे प्रस्तुत किए जाते रहे हैं। ऐसे दावों का आधार प्रायः पुराने मानचित्रों, गोरखा साम्राज्य के विस्तारकाल अथवा सुगौली संधि की विभिन्न व्याख्याओं को बनाया जाता है । इतिहास का गंभीर अध्ययन बताता है कि किसी क्षेत्र पर किसी साम्राज्य का अस्थायी सैन्य नियंत्रण आधुनिक राजनीतिक स्वामित्व का स्वतः आधार नहीं बन जाता । अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में गोरखा राज्य ने कुमाऊँ, गढ़वाल तथा हिमालय के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया था ।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्राचीन भारत का इतिहास केवल आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की सीमाओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता । वैदिक साहित्य, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, बौद्ध और जैन परंपराएँ एक ऐसे व्यापक भारतवर्षीय संसार की ओर संकेत करती हैं, जो आधुनिक भारत, नेपाल तथा आसपास के अनेक क्षेत्रों तक विस्तृत था । यह कहना भी पूर्णतः उचित नहीं होगा कि भारतवर्ष केवल सांस्कृतिक अवधारणा था । विभिन्न कालों में कुरु, पांचाल, कोशल, विदेह, मगध जैसे महाजनपद तथा बाद में मौर्य, गुप्त और अन्य शक्तिशाली राजसत्ताएँ इस भूभाग के बड़े हिस्से पर राजनीतिक अधिकार भी स्थापित करती रहीं । अतः भारतवर्ष में सांस्कृतिक एकता और राजनीतिक विविधता दोनों साथ-साथ विद्यमान थीं । इसी प्रकार इतिहास में मौर्य, गुप्त, कुषाण, मुगल और ब्रिटिश साम्राज्यों का विस्तार वर्तमान राष्ट्रीय सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक रहा है । यदि किसी एक ऐतिहासिक काल के राजनीतिक नियंत्रण को वर्तमान क्षेत्रीय दावों का आधार मान लिया जाए, तो विश्व की अधिकांश सीमाएँ पुनः विवादित हो जाएँगी ।
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था प्राचीन साम्राज्यों की सीमाओं के आधार पर नहीं, बल्कि मान्य संधियों, अंतरराष्ट्रीय कानून और पारस्परिक सहमति के आधार पर संचालित होती है ।1816 ईस्वी की सुगौली संधि आधुनिक भारत-नेपाल सीमा इतिहास का एक महत्वपूर्ण आधार है । इसके पश्चात जो सीमाएँ विकसित हुईं, वे आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था का अंग बन गईं । कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे विवादों पर दोनों देशों के अपने-अपने तर्क हो सकते हैं, किन्तु उनका समाधान इतिहास की भावनात्मक व्याख्याओं से नहीं, बल्कि अभिलेखीय साक्ष्यों, कूटनीतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर ही संभव है ।
विशेष रूप से अल्मोड़ा और गढ़वाल के संदर्भ में यह भी स्मरण रखना चाहिए कि स्थानीय लोकस्मृति में गोरखा शासन को सामान्यतः एक कठिन काल के रूप में याद किया जाता है । गढ़वाली लोकगीतों, लोककथाओं तथा क्षेत्रीय इतिहास में “गोरख्याणी” काल का उल्लेख कराधान, बेगार और संघर्ष के संदर्भ में मिलता है । इसलिए इतिहास का मूल्यांकन केवल विजेताओं की दृष्टि से नहीं, बल्कि स्थानीय समाजों के अनुभवों के आधार पर भी किया जाना चाहिए ।
अंततः नेपाल और भारत के संबंधों का मूल आधार सीमा-विवाद नहीं, बल्कि साझा सभ्यतागत विरासत है । जनकपुर और अयोध्या, लुम्बिनी और बोधगया, पशुपतिनाथ और काशी, मिथिला और गंगा-यमुना की सांस्कृतिक परंपराएँ इस बात की साक्षी हैं कि दोनों देशों का संबंध किसी एक संधि, मानचित्र या राजनीतिक विवाद से कहीं अधिक गहरा और प्राचीन है । इतिहास का उद्देश्य वर्तमान सीमाओं को अस्थिर करना नहीं, बल्कि उन सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक सूत्रों को समझना है जिन्होंने सहस्राब्दियों तक हिमालय से समुद्र तक विस्तृत इस सभ्यता को एक साझा चेतना में बाँधे रखा।
निष्कर्ष
उपलब्ध वैदिक, पौराणिक, अभिलेखीय और ऐतिहासिक साक्ष्य एक संतुलित निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं । नेपाल का प्राचीन अस्तित्व निर्विवाद है। वर्तमान स्वरूप का एकीकृत नेपाल अठारहवीं शताब्दी में निर्मित हुआ। नेपाल लंबे समय तक अनेक राज्यों में विभाजित रहा । साथ ही उसकी धार्मिक, भाषिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक परंपराएँ भारतवर्षीय सभ्यता से गहराई से जुड़ी रही हैं । अतः सबसे संतुलित ऐतिहासिक निष्कर्ष यही है कि आधुनिक भारत और नेपाल दो स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्र हैं, किंतु उनकी सांस्कृतिक स्मृति, धार्मिक परंपराएँ, तीर्थ-संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत एक ही व्यापक भारतवर्षीय सभ्यता की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं । राजनीतिक सीमाएँ उन्हें अलग राष्ट्र बना सकती हैं, किन्तु इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म के स्तर पर दोनों की जड़ें आज भी एक ही प्राचीन सभ्यतागत धारा में गहराई से जुड़ी हुई हैं । नेपाल और भारत का संबंध केवल पड़ोसी राष्ट्रों का संबंध नहीं है; यह हिमालय से गंगा तक, जनक से राम तक, लुम्बिनी से बोधगया तक और पशुपतिनाथ से काशी तक फैली हुई एक साझा सभ्यतागत यात्रा की स्मृति है । इतिहास का दायित्व राष्ट्रों के बीच दीवारें खड़ी करना नहीं, बल्कि उन गहरे सांस्कृतिक सूत्रों को पहचानना है – जो समय, सीमाओं और राजनीति से परे मानव समुदायों को जोड़ते हैं ।
लेखक परिचय
डॉ. कमलाकान्त बहुगुणा वैदिक दर्शन, भारतीय संस्कृति, योग, अध्यात्म, राष्ट्रचिंतन और इतिहास के गंभीर अध्येता, लेखक एवं वक्ता हैं। वे भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक साहित्य, आर्य समाज, सांस्कृतिक इतिहास तथा मानवीय चेतना के विविध आयामों पर निरंतर लेखन एवं शोधकार्य कर रहे हैं।
उनकी विशेष रुचि भारतवर्षीय सभ्यता, वैदिक जीवन-दृष्टि, योग-विज्ञान, भारतीय इतिहास तथा सांस्कृतिक पुनर्जागरण से संबंधित विषयों में है। वे जटिल ऐतिहासिक और दार्शनिक विषयों को सरल, तार्किक और शोधपरक शैली में प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं।
डॉ. बहुगुणा का मानना है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक स्मृति, आध्यात्मिक चेतना और ज्ञान-परंपरा में निहित होती है। उनके लेख और व्याख्यान भारतीय सभ्यता की मूल अवधारणाओं को समकालीन संदर्भों में समझने का प्रयास करते हैं।
